एक समय ऐसा होता है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सब कुछ सामान्य तरीके से चल रहा होता है जैसे कि — नौकरी, व्यवसाय, बच्चों की पढ़ाई, घर का बजट। और फिर अचानक परिवार के किसी सदस्य की तबियत ख़राब होती और डॉक्टर से इलाज प्रारम्भ होता है फिर एक बड़ी बीमारी का पता चलता है तो व्यक्ति की मानसिकता बदल जाती है, इलाज शुरू होता है, मेडिकल टेस्ट, डॉक्टर की फीस, दवाइयाँ, अस्पताल के बिल… और देखते ही देखते आपकी सारी सेविंग्स खत्म हो जाती हैं। न सिर्फ आपकी आर्थिक स्थिति डगमगाती है, बल्कि मानसिक तनाव, रिश्तों में खटास और सामाजिक असहायता भी साथ आने लगती है।
इस समस्या से ग्रसित आप अकेले नहीं हैं। लाखों भारतीय हर साल इसी स्थिति से गुजरते हैं। आइये इसके बारे में ध्यान केंद्रित करते है –
भारत में मेडिकल खर्चों की सच्चाई
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की लागत दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है ऐसा तो आप सभी जानते ही है । सरकारी सुविधाएं उपलब्ध तो है, और नित नई व्यवस्थायेें लागू भी की जा रही है परन्तु उनका क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं हो रहा है या कर्मचारियों दवारा लापरवाही की जा रही है, और प्राइवेट अस्पतालों की फीस आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है इस कारण प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति परेशांन हो जाता है। अब आइए एक नज़र डालते हैं कुछ चौंकाने वाले आंकड़ों पर:
- नीति आयोग (NITI Aayog) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 60% से ज़्यादा मेडिकल खर्च जेब से देना पड़ता है।
- हर साल लगभग 5 करोड़ भारतीय परिवार स्वास्थ्य खर्चों के कारण गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं।
कैंसर, किडनी फेलियर, हार्ट डिज़ीज़ जैसी बीमारियों के इलाज में लाखों रुपये खर्च होते हैं, जिनमें बीमा भी पर्याप्त नहीं होता।
एक सच्ची कहानी – आम आदमी की असली तकलीफ़
रामप्रसाद जी एक मध्यम वर्गीय परिवार से है । दो बच्चे, और एक प्राइवेट जॉब। अचानक उनकी तबियत ख़राब होती है, उन्हें ब्लड कैंसर डायग्नोज़ हुआ। इलाज दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में हुआ, जिसकी लागत ₹18 लाख से ज़्यादा बैठी। बीमा केवल ₹2 लाख कवर कर सका। पहले सेविंग्स, फिर गहने, फिर लोन… और आखिरकार घर तक बिक गया, अच्छा ये हुआ कि उनकी जान बच गयी और
आज उनका परिवार पुनः स्थिरता पाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मानसिक और आर्थिक असर अभी भी बना हुआ है।
बीमारी के समय क्या होता है?
1. अचानक खर्चों का पहाड़ टूटता है – जब कोई गंभीर बीमारी होती है, तो यह केवल एक बीमारी नहीं होती; यह एक इकोनॉमिक क्राइसिस होती है।
2. सेविंग्स खत्म होती हैं – जितना बचाया था, वह इलाज में लग जाता है।
3. लोन की ज़रूरत पड़ती है – बैंक या रिश्तेदारों से पैसे उधार लेने की नौबत आती है।
4. भावनात्मक तनाव – पैसे की कमी के कारण परिवार में तनाव बढ़ता है।
5. सामाजिक दूरी – कुछ समय के उपरांत लोग मदद करने की बजाय किनारा करने लगते हैं।
हेल्थ इंश्योरेंस: क्या ये काफी है?
जवाब है — नहीं हमेशा नहीं।
- हर व्यक्ति के पास हेल्थ इंश्योरेंस नहीं होता।
- जो बीमा है, उसमें क्लेम करने की प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है।
- कई बार बीमारियाँ पॉलिसी में कवर ही नहीं होतीं।
- लिमिटेड कवरेज गंभीर बीमारियों के लिए पर्याप्त नहीं होता।
- मौसमी और छोटी, ऐसी बीमारी जो की हॉस्पिटलाइज होने की जरूरत नहीं होती है उन बीमारियों में हेल्थ इंश्योरेंस का लाभ नहीं मिलता।
हेल्थ इंश्योरेंस का समाधान की तलाश: नया दृष्टिकोण
हमें एक ऐसे सिस्टम की ज़रूरत है जो:
- बिना अतिरिक्त बोझ के हेल्थ फंड तैयार करे।
- सीधे हमारे खर्च से जुड़े और हमें फायदा दे।
- पारदर्शी हो और समाज सेवा से जुड़ा हो।
इसी सोच से जन्म हुआ – ProSev (लाभ + सेवा) का
ProSev क्या है?
ProSev एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जो आपकी रोज़मर्रा की शॉपिंग को भविष्य की मेडिकल सुरक्षा में बदल देता है। आप जैसे-जैसे शॉपिंग करते हैं, उसका एक हिस्सा आपके हेल्थ फंड में पॉइंट्स के रूप में जमा होता है, जिसे आप जरूरत के समय इलाज में इस्तेमाल कर सकते हैं।
मूल विचार: “आपका खर्च ही आपकी सुरक्षा बन जाए।”
आइये जानते है ProSev कैसे काम करता है?
1. आप खरीदारी करते हैं – ProSev के ऑनलाइन स्टोर से।
2. आपको पॉइंट्स मिलते हैं – हर खरीद पर एक हिस्सा आपके हेल्थ अकाउंट में।
3. यह पॉइंट्स भविष्य में इलाज में काम आते हैं – अस्पताल, दवाइयाँ, टेस्ट आदि के लिए।
ProSev क्यों है खास?
विशेषता | विवरण |
✅ जीरो एक्स्ट्रा इन्वेस्टमेंट | कोई अलग से पैसा नहीं देना |
✅ पारदर्शिता | सभी लाभ स्पष्ट रूप से बताए गए हैं |
✅ सभी के लिए | कोई आय सीमा या शर्त नहीं |
✅ सेवा भावना | प्रॉफिट का हिस्सा जरूरतमंदों की सहायता में |
